कांग्रेस में हार की वजहों को लेकर तेज हुई बहस

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पांच में से चार राज्यों में हुई शिकस्त ने कांग्रेस को एक बार फिर आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है. हार के कारणों पर विचार करने के लिए पार्टी जल्द ही राज्यवार समीक्षा की तैयारी कर रही है. हार को लेकर पार्टी के अंदर अलग-अलग राय है, पर ज्यादातर नेता इस बात पर सहमत हैं कि पार्टी हिंदी भाषी मतदाताओं की नब्ज पकड़ने में नाकाम रही है.

हिंदी पट्टी से कांग्रेस लगभग खत्म इस हार के बाद हिंदी पट्टी से कांग्रेस लगभग खत्म हो गई है. उत्तर भारत में पार्टी की सिर्फ हिमाचल प्रदेश में सरकार है. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ है. वर्ष 1998 में जब कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी ने जिम्मेदारी संभाली थी, तब पार्टी सिर्फ एक हिंदी भाषी राज्य सहित सिर्फ तीन प्रदेशों में सत्ता में थी. मध्य प्रदेश, ओडिशा और मिजोरम में सरकार थी.

कार्ति के ट्वीट द साउथ ने पार्टी के अंदर बहस छेड़ी तेलंगाना में जीत के बाद लोकसभा सांसद कार्ति चिदंबरम के ट्वीट द साउथ ने पार्टी के अंदर बहस छेड़ दी है. कभी हिंदी भाषी प्रदेशों की राजनीति करने वाली कांग्रेस अब पूरी तरह दक्षिण पर निर्भर है. पार्टी संगठन में भी दक्षिण भारत के नेता अहम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी वायनाड (केरल) से लोकसभा सांसद हैं.

उत्तर और दक्षिण की चुनाव रणनीति में काफी फर्क उत्तर और दक्षिण में चुनावी मुद्दे, प्रचार का तरीका और चुनाव रणनीति में काफी फर्क है. पार्टी के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा कहते हैं कि संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर हिंदी भाषी नेताओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर है. इसका असर कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा है.

भाषाई दिक्कत भाषाई दिक्कत के चलते कार्यकर्ता नेतृत्व के सामने खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते हैं. इससे पार्टी नेतृत्व तक सिर्फ वही बात पहुंचती है, जो प्रदेश कांग्रेस के नेता उन तक पहुंचाते हैं. यही वजह है कि आक्रामक चुनाव प्रचार के बावजूद पार्टी हिंदी भाषी राज्यों में जमीनी हकीकत भांपने में नाकाम रही.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी को इस बारे में विचार कर आवश्यक बदलाव करने चाहिए. ताकि, पार्टी फिर से उत्तर भारत का भरोसा जीत सके.