मोदी के चेहरे पर जनता ने पूरा भरोसा जताया

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नई दिल्ली . पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी के साथ बिना चेहरे के चुनाव लड़ने की भाजपा नेतृत्व की चुनावी रणनीति पूरी तरह से खरी उतरी है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसने बड़ी जीत हासिल की है, जबकि तेलंगाना में अपनी ताकत बढ़ाई है. यह जीत इसलिए भी अहम है, क्योंकि कुछ महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं. इन नतीजों ने भाजपा के लिए भावी चुनावी पिच भी तैयार कर दी है. उसका मिजाज भी बता दिया है.

पांच साल पहले भाजपा ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के हाथों हार से सत्ता गंवा दी थी. बाद में कांग्रेस की टूट से मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार तो बन गई थी, लेकिन राजस्थान व छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकारें थी. भाजपा ने इन चुनावों के लिए नई रणनीति तैयार की और उस पर अमल करते हुए चुनाव लड़ा. इसके सबसे अहम पहलू था मोदी की गारंटी. राज्यों के क्षत्रपों के नामों को आगे रखने के बजाए खुद प्रधानमंत्री सामने आए और अपनी यानी मोदी की गारंटी जनता को दी. मोदी ने राज्यों से खुद को जोड़ा.

लोकसभा चुनावों में नरेंद मोदी को अपने इस जुड़ाव से लाभ मिलता रहा है. अब राज्यों में भी उसका यह दांव जमकर चला. भाजपा ने चुनावों में अपने केंद्रीय नेताओं को भी उतारा और साफ किया कि वह गंभीरता से चुनाव लड़ रही है. दूसरी तरफ राज्यों के क्षत्रपों को चुनावी चेहरा नहीं बनाया, लेकिन प्रमुख नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा. नए चेहरों के साथ वरिष्ठ नेताओं को भी उतारा. इससे सत्ता विरोधी माहौल की काट के साथ विश्वास का माहौल बना.

क्षत्रपों को नहीं बनाया चेहरा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और रमन सिंह अग्रिम प्रचार मोर्चे पर थे, लेकिन चुनाव के चेहरे नहीं थे. पार्टी की यह रणनीति सटीक बैठी और बागियों के बावजूद कार्यकर्ताओं और नेताओं में भितरघात व गुटबाजी नहीं हुई.

रणनीति बदलने से असर

भाजपा को केवल तेलंगाना में अपेक्षित सफलता नहीं मिली है. इसकी वजह राज्य में प्रभावी नेतृत्व की कमी, कर्नाटक में हार के बाद रणनीति में बदलाव प्रमुख रहा. राज्य में मुख्यमंत्री केसीआर के खिलाफ चेहरा बने संजय बंडी को प्रदेश अध्यक्ष से हटाकर केंद्र में लाना और केंद्र में मंत्री किशन रेड्डी को अध्यक्ष बनाने से पार्टी के आक्रामक तेवर कम हुए. किशन रेड्डी के चुनाव न लड़ने से भी जरूरी संदेश नहीं गया. हालांकि, भाजपा की सीटें और वोट बढ़े हैं और लोकसभा के लिए माहौल बना है.